किसे याद रखूं किसे....
Author in late 1970s. Pic courtesy Aloke Gupta
किसे याद रखूं
किसे भूल जाऊं
कि तुम कौन हो
नाम क्या है मेरा
ये किससे मैं पूछूं
और किसको बताऊँ
मगर सच तो ये है
कि बस में नहीं है
इसे याद रखना
उसे भूल जाना
नहीं याद आये
तो कैसे बताऊँ
तुम्ही अब ये बोलो
क्या सच ये नहीं है
तुम्हारे होठों पे हमेशा
नाम होता था मेरा
और तुम्हारे नाम से
होता था मेरा सवेरा
अब ये है आलम
भूल जाना अदा है
ये किसने कहा
याद रखना वफ़ा है
मगर ये अदा है
और न ही वफ़ा है
ये तो मेहरबां
बुढ़ापे का फलसफा है !!
- April 22, 2026
सिलसिले
लफ़्ज़ों के गुम हो जाने का सिलसिला
कुछ नया नया सा है
लगता है बस ज़ुबान पर ही रखें हैं
मगर रहते हैं ग़ायब
फिर मिल जाते हैं बेवजह
इधर उधर बिखरे हुए
और हो जाते हैं मेरे लबों से वाबस्ता
सोचता हूँ कहाँ चले जाते हैं ये लफ्ज़
ये यादें, ये चेहरे, ये नाम
क्या यूं ही ग़ायब हो जाते हैं
बस मुझे सताने के लिए
या ज़िन्दगी की चकमा देने की आदत
अभी भी कायम है
आजकल अक्सर गुम हो जाते हैं
शायद मेरे फ़ोन, मेरी चाबी के गुच्छे से भी ज़्यादा
जब मैं नहीं ढूंढ पाता
मिल जाते हैं कभी कभी
मेरे आस पास बैठे दोस्तों, रिश्तेदारों को
और बाँट लेते हैं हम सब उन लफ़्ज़ों को
पुरानी यादों की तरह
कैसे ढूढूं इन लफ़्ज़ों को मैं
कहाँ छुपे रहते हैं
पहले मिल जाते थे
दिमाग़ की दराज़ों में
और सब दराज़ों की चाबियां
होती थी मेरी मुट्ठी में
क्या लफ्ज़ भी बुढ़ा जाते हैं
फूलों, कपड़ों, कागज़ और चेहरों की तरह
बार बार इस्तेमाल से हो जाते हैं बेज़ार
और ढूंढते हैं छुपने के बहाने
या छुप जाते हैं उन दराज़ों में
जिनकी चाबियां मुझसे गुम हो गयी हैं
ये भी मुमकिन है कि खोये नहीं हैं ये
मैंने ही दे दिया है इन लफ़्ज़ों को
अपनों को, दोस्तों, रिश्तेदारों को
और वो ले आते हैं
वापस उनको मेरे पास
रख देते हैं मेरी जेब में
मेरे तकिये के नीचे
जब दिल किया उठा लेता हूँ तकिया
टटोल लेता हूँ जेब
कुछ लफ्ज़ तो मिल ही जाते हैं
और आ जाते हैं लबों पे
ये सिलसिला भी अच्छा है
हमेशा न सही
मगर चलता रहेगा अभी
Written – July 13, 2023
Uploaded – April 22, 2026
Picture taken on March 13, 2017 by the author on IIM, Ahmedabad campus