Moon Springs

सिलसिले

लफ़्ज़ों के गुम हो जाने का सिलसिला 
कुछ नया नया सा है 
लगता है बस ज़ुबान पर ही रखें हैं 
मगर रहते हैं ग़ायब 
फिर मिल जाते हैं बेवजह 
इधर उधर बिखरे हुए 
और हो जाते हैं मेरे लबों से वाबस्ता 

सोचता हूँ कहाँ चले जाते हैं ये लफ्ज़ 
ये यादें, ये चेहरे, ये नाम 
क्या यूं ही ग़ायब हो जाते हैं 
बस मुझे सताने के लिए 
या ज़िन्दगी की चकमा देने की आदत 
अभी भी कायम है 

आजकल अक्सर गुम हो जाते हैं 
शायद मेरे फ़ोन, मेरी चाबी के गुच्छे से भी ज़्यादा  
जब मैं नहीं ढूंढ पाता 
मिल जाते हैं कभी कभी 
मेरे आस पास बैठे दोस्तों, रिश्तेदारों को 
और बाँट लेते हैं हम सब उन लफ़्ज़ों को 
पुरानी यादों की तरह 

कैसे ढूढूं इन लफ़्ज़ों को मैं 
कहाँ छुपे रहते हैं 
पहले मिल जाते थे 
दिमाग़ की दराज़ों में 
और सब दराज़ों की चाबियां 
होती थी मेरी मुट्ठी में 

क्या लफ्ज़ भी बुढ़ा जाते हैं 
फूलों, कपड़ों, कागज़ और चेहरों की तरह 
बार बार इस्तेमाल से हो जाते हैं बेज़ार 
और ढूंढते हैं छुपने के बहाने 
या छुप जाते हैं उन दराज़ों में 
जिनकी चाबियां मुझसे गुम हो गयी हैं 

ये भी मुमकिन है कि खोये नहीं हैं ये 
मैंने ही दे दिया है इन लफ़्ज़ों को 
अपनों को, दोस्तों, रिश्तेदारों को 
और वो ले आते हैं 
वापस उनको मेरे पास 
रख देते हैं मेरी जेब में 
मेरे तकिये के नीचे 
जब दिल किया उठा लेता हूँ तकिया 
टटोल लेता हूँ जेब 
कुछ लफ्ज़ तो मिल ही जाते हैं   
और आ जाते हैं लबों पे 

ये सिलसिला भी अच्छा है 
हमेशा न सही 
मगर चलता रहेगा अभी 

Written – July 13, 2023
Uploaded – April 22, 2026

Picture taken on March 13, 2017 by the author on IIM, Ahmedabad campus

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